पिंड दान गया जी में संपन्न होने वाला सबसे प्रमुख एवं पावन वैदिक अनुष्ठान है, जिसमें दिवंगत पूर्वजों को "पिंड" — चावल, जौ के आटे, काले तिल, शहद एवं शुद्ध घी से बना एक प्रतीकात्मक गोला — अर्पित किया जाता है।
यह अनुष्ठान वैदिक मंत्रों के उच्चारण के साथ संपन्न होता है और इसका उद्देश्य पूर्वजों की आत्मा को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर करना है। शास्त्रों के अनुसार यह प्रत्येक व्यक्ति का अपने पूर्वजों के प्रति एक पवित्र कर्तव्य माना गया है।
गरुड़ पुराण सहित अनेक धर्मग्रंथों में गया जी को पिंड दान हेतु सर्वश्रेष्ठ एवं एकमात्र संपूर्ण फलदायी स्थान बताया गया है। यहां किया गया पिंड दान "पितृ ऋण" से मुक्ति दिलाता है — जो शास्त्रों में वर्णित तीन प्रमुख ऋणों (देव ऋण, ऋषि ऋण, पितृ ऋण) में से एक है।
मान्यता है कि गया जी में विष्णुपद मंदिर परिसर, फल्गु नदी तट अथवा अक्षयवट के नीचे किया गया पिंड दान अक्षय फल प्रदान करता है और पितरों को तीन पीढ़ियों तक तृप्ति मिलती है।
यजमान द्वारा पूर्वजों के नाम एवं गोत्र सहित पवित्र संकल्प लिया जाता है।
फल्गु नदी में स्नान कर तन-मन की शुद्धि प्राप्त की जाती है।
मंत्रोच्चार सहित विष्णुपद मंदिर परिसर में पिंड अर्पित किए जाते हैं।
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